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आखिर कब तक आखिर कब तक उन कोनो में छिप छिप कर अपने आॅसुओ को अपने अंदर जलती ज्वाला से सुखाओगी तुम ? आखिर कब तक दोषी न होने पर भी चुपचाप बेबस सी रहकर गालियाँ सुनोगी तुम ? आखिर कब तक अपने सिर पर सजे सिंदूर की भरपाई अपने आत्म सम्मान से करती रहोगी तुम ? आखिर कब तक अपने जले हाथों के दागों को मेहंदी से छिपाओगी , उन तमाचों के दागों को पाउडर व लाली से सजाओगी , और हर सुबह हमेशा की तरह मुखौटा पहन कर घर के कामों में लग जाओगी । बस एक बार समय के कांटो को दोहरा कर तो देखो , उन लमहों को एक दफा बुला कर के तो देखो , जब तुम इस मंगल सुत्र और सिंदूर के शिकंजे से परे हुआ करती थी । अपनी मर्जी की मालकिन तुम खुद हुआ करती थी , अपने सपनों को चूमने की आस रखा करती थी । सोचो एक दफा , क्या इतनी बड़ी कीमत थी उस वरमाला की? सोचो कितना पसीजता होगा तुम्हारा दिल , उस जिंदा दिली की धड़कन से बिछड़कर , उन हैवानियत के पंजों को सह सहकर , कैसा झुलस चुका होगा तुम्हारा दिल कि अब बस उसकी रूह रूह भी काॅप उठती होगी आवाज उठाने के बारे में भी सोच कर , और शायद बेचारा केवल इसी लिए मजबूर है वो तुम्हे यह समझाने पर कि तुम चाहकर भी कुछ न कर पाओगी । बस सिर्फ एक बार कोशिश करो और सुन लो अपने अंदर की उस दबी आवाज को । चीखती हुई उन जंजीरों से बंधी जिंदा दिली के धड़कन की उस पुकार को : अपने खुद की पहचान को। तो अब फेंक दो उस मुखौटे को और चल चलो अपने सपनों की गली , के अपने सपनों को दुबारा निकाल कर संदूकों से बाहर कर दो उन्हें पूरा और लगा दो मरहम उस घाव से झुलस रहे दिल पर । की वो बेबस हो जाए तुमसे यह कहने पर , गलत के खिलाफ आवाज तो उठाओ , स्वयं खुद को उन जंजीरों से तो छुड़ाओ , तुम बस अपना हौसला बढ़ाओ , और अपनी पहचान बनाओ । क्योंकि कोशिश करने वालों की कभी हार नही होती , अपने सपनों को सच कर दिखाने वालों की गुंजाइशे कभी अधूरी नही रहती । सुरक्षा जैन

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