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लखनऊ की शाम थी और मैं पहली बार लखनऊ में था, मेरे सामने ऑटो के रुकते ही लालबाग की भीड़ छट गयी जैसे बारिश के बाद बादल छँटते हो और उसकी बाजु वाली सीट खाली हुई और मैं हड़बड़ी में जा बैठा ! उसके दोनों कान में बड़े बड़े झुमके थे मानो एक साइड का वजन एक पाव हो, गले में बड़ी सी गटारन की माला थी, माथे पर बैंगनी रंग की छोटी बिंदी और सफ़ेद कुर्ती पर हरे रंग का दुपट्टा लिए थी । नाक के दायीं तरफ़ नथ थी और जरिदार मोजरी ने शायद मखमली तलवों के साथ चुप-चाप कोई ज़ख्म दे कर बड़े सलीके से उन्हे ढंका हुआ था । जनपथ मार्किट के कुछ पैकेट्स हाथ में थे शायद वो शौपिंग कर के आ रही थी, चेहरे पर हल्की थकान उसकी मासूमियत को और निखर रही थी । गाल पर पड़ने वाले डिम्पल में मेहरून बाल के लट का हिस्सा घुसा जा रहा था और उसी हिस्से में मैं अपना दिल बैठाने की जुगाड़ में था । उस वक़्त हम दोनों में दो चीज सिमिलर थी एक गालों पे पड़ने वाला डिम्पल और दूसरा आंखो में लगा काले फ्रेम का बड़ा वाला चश्मा । वो बिलकुल मेरी इन्स्टाग्राम की फोल्लोविंग लिस्ट वाली लड़की की तरह नज़र आ रही थी जिसकी प्रोफाइल मैं हर रोज़ निहारता था, एक पल के लिए तो मैंने सोचा के पूछ लू के कही वो ही तो नहीं पर मैंने अपने इन्ही ख्यालो को ख़ुद से ही खारिज़ कर दिए । और इसी बीच दिल के तार जुड़ने की कवायत में था कि नेहरु एन्क्लेव आते ही उसे मुर्झाई शक्ल लेकर उतरना पड़ गया और मैं अपना आधा बचे-खुचे दिल में एक सवाल लेकर विभूति खांद में उतर आया कि अक्सर जो मिलता है वो किसी ना किसी मोड़ पर बिछड़ क्यूँ जाता है। पर शाम को फिर से उसके दीदार के लिए मैंने इन्स्टाग्राम खोला तो सबसे पहले उसी की जनपथ शौपिंग वाली स्टोरी दिखी, वो ऑटो वाली लड़की यही थी । और मैं अपने होटल रूम में वो देखने के बाद मुस्कुराने के आलावा और कुछ नही कर पाया । कई बार ऐसा होता है जो हम चाहते है जो खोजते है वो हमारे सामने ही होता है पर हम देख नही पाते जैसे मैं देख नही पाया । पर सही भी हुआ लखनऊ फिर से आने की वजह जो मिल गई थी मुझे और फ़िलहाल मैं सफ़र में ही हूँ उसकी लड़की की तलाश में फिर से ।💕. . ~ निशांत 'फ़ितूरी'.