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मौत मौत.....!! मौत सहज होती है, बिल्कुल सहज....बहुत सहज....बेहद सहज! शायद इससे सहज कोई और चीज या और कोई बात तो हो ही नही सकती! मौत इतनी सहज है! मौत सहज कैसे होती है..!! होती है मौत इतनी सहज होती जैसे कि जैसे आपका कोई दोस्त आपको गले लगता है। इतनी सहज जितना आप किसी परिचित को देख कर मुस्कुरा देते है..! इतनी सहज जैसे रोज सुबह उठते ही आप फिर सो जाना चाहते हो। मौत इतनी ही सहज होती है! मौत को सिर्फ हमने आपने और हम सब ने मिल कर एक हौवा बना रखा है हमने और आपने मौत को लेकर कितनी ही मनघडंत कहानियां बना रखी और और सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम उस पर यकीन भी करते है और उन्ही कहानियों को जीते भी है! हम मौत को कहानी का विलन बना कर खुद को और जिन्दगी को गफ़लत में रखते है पर मौत तो विलन हो ही नही सकती, इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि मौत तो हीरो है...मौत ही तो मेन करैक्टर है जो किसी फ़िल्मी हीरो की ही तरह भले अंत तक परेशान होती रहे या जिन्दगी से हारती रहे पर अंत में, बिल्कुल अंत में जा कर जीत जाती है....! अंत में जीत मौत की ही होती है और जिन्दगी और जिंदगानी दोनों ही मौत के आगे घुटने टेक देते है! हमने खुद को अपने ही बनाये मायाजाल में ऐसा उलझा के रखा है कि हमे ये पता ही नही चल पाता कि जिन बातों को हमने हक़ीकत मन लिया है वैसा तो कुछ है ही नही....!! हमारे लिए मौत सामान्य नही होती, हमारे लिए मौत सहज नही होती क्योंकि हमने मान लिया है कि मौत कभी सामान्य रूप में नही होती, मौत कभी कहानी के बीच मे नही होती क्योंकि मौत तो एंडिंग है और एंडिंग हमेशा अंत मे होता है। और एंडिंग या तो हैप्पी होती है या सैड, एंडिंग कभी नार्मल नही होती इसी तरह मौत भी कभी कभी नार्मल नही होती वो भी या तो हैप्पी होती है या फिर सैड...!! और हम एंडिंग को लेकर इतने असहज है कि हमें मौत भी असहज लगती है। पर हक़ीकत ये है कि मौत और कहानी का अंत दोनों ही सामान्य होता है क्योंकि ना ही मौत एक बार में आ जाती है और ना ही कहानी का अंत...!! दोनों दोनों ही पड़ाव-दर-पड़ाव नजदीक आते है दोनों ही समय समय पर खुद के पास आने और खुद के अस्तित्व के होने का प्रमाण देते है पर हम ही है जो इतने आशावादी बने होते है कि हम उसे सिर्फ एक पड़ाव मान लेते है और ये मान लेते है कि ऐसे कई पड़ाव आने के बावजूद ये सफ़र ऐसे ही चलता रहेगा! हमारे लिए किसी कहानी का अंत सिर्फ अंत में होता है हमारे लिए कोई ईमारत एक बार में ही धाराशाही हो जाती है हमारे लिए कोई एक ही बार में मर जाता है पर पर ये तो सिर्फ हमारे कल्पना है और हमारी सोच है ना!! कोई भी कहानी अंत में अचानक नही ख़त्म होती, वो पन्ने दर पन्ने, चैप्टर दर चैप्टर, किरदार दर किरदार ख़त्म होती रहती है किसी किरदार के ख़त्म हो जाने पर कहानी का एक हिस्सा ख़त्म हो जाता है किसी किरदार के लिए बचे प्यार और सम्मान के ख़त्म हो जाने से कहानी का एक हिस्सा ख़त्म हो जाता है किसी चैप्टर में किसी नायक को नायिका के प्रेम के मिल जाने पर कहानी का एक हिस्सा ख़त्म हो जाता है पर हम सिर्फ उसके अंत पर ही उसका अंत देख पाते है क्योंकि हम किसी किरदार का मरना, नायक को प्रेम मिलना, किसी किरदार के तिरस्कार की बाते को अंत समझ ही नही पाते और अपनी ही कहानी में जीते रहते है हम किसी ईमारत का गिरना तभी देख पाते है जब वो ईमारत गिर जाती है हम ईमारत के गिरने की शुरुआत की वो दरार कभी देख ही नही पाते, हमसे ईमारत से गिरती हुई पहली ईंट का गिरना सिर्फ एक सामान्य सी बात का संकेत समझ लिया जाता है क्योंकि हम तो ईमारत के गिरने पर भी ईमारत का टूटना समझेगें