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इन इतिहासकारों ने समाज को कई महत्वपूर्ण जानकारियों से दूर रखा हुआ है, खास कर भारत की आज़ादी से जुड़े ऐसे कितने ही तथ्य है जो या तो किताबो में ही खो गये या फिर उन्हें दबा दिया गया। भारत में अंग्रेजो के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई लड़ने में लाखो लोगो ने अपना सब कुछ खो दिया पर इतिहास ने जगह दी तो सिर्फ कुछ ही लोगो को और बाकि सबको भुला दिया। रासबिहारी बोस भारत के एक ऐसे क्रान्तिकारी नेता थे जिनसे स्वयं अंग्रेजी सरकार खौफ खाती थी। उनके बारे में बात करते हुए अंग्रेजी अफसर कहते थी कि अगर उन्हें अन्य क्रांतिकारियों की सहायता मिलती तो भारत कब के गुलामी के जंजीरों से मुक्त हो जाता। लॉर्ड एटली ने किया था बोस के ख़ौफ़ का ख़ुलासा- तबके कोलकाता हाइकोर्ट के चीफ़ जस्टिस पीवी चक्रबर्ती 30 मार्च, 1976 को लिखा है, “1956 में जब मैं प.बंगाल का गवर्नर था, तो ब्रिटिश पीएम एटली से मिला. मैंने उनसे सीधा सवाल यही पूछा कि सन् 47 में तो गाँधी जी का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन ठंडा पड़ गया था, फिर वो क्या वजह थी जो अंग्रेजों ने इतना आनन-फानन में देश छोड़ने का फ़ैसला ले लिया. एटली ने जो सबसे ख़ास कारण गिनाया वो था, आज़ाद हिंद फ़ौज़ का आतंक. एटली ने भी ये कहा कि अंग्रेजों के देश छोड़ने के डिसीजन पर क्विट इंडिया मूवमेंट का सबसे कम असर पड़ा.” ऐसे ही एक क्रन्तिकारी थे रासबिहारी बोस। बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गाँव में २५ मई १८८६ को पैदा हुए रासबिहारी बोस भारत को आजाद कराने में अद्वितीय भूमिका निभाई थी। रासबिहारी बोस वही शख्स थे जिन्होंने जापान में जा कर आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की थी (वही आजाद हिन्द फ़ौज जिसे बाद में सुभाष चन्द्र बोस जी का नेतृत्व प्राप्त हुआ था और सुभाषचंद्र बोस नेताजी के नाम से जाने जाने लगे ) रासबिहारी बोस भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुद्ध गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।दिसंबर 1911 में ‘दिल्ली दरबार’ के बाद जब भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली के चांदनी चौक में निकाली जा रही थी तब हार्डिंग पर बम फेंका गया परन्तु वो बाल-बाल बच गए। युगांतर दल के सदस्य बसन्त कुमार विश्वास ने हार्डिंग की बग्गी पर बम फेंका था लेकिन निशाना चूक गया। बम फेंकने की इस योजना में रासबिहारी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बसंत तो पकड़े गए पर बोस ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिये रातों-रात रेलगाड़ी से देहरादून चले गए और अगले दिन कार्यालय में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अंग्रेजी प्राशासन को उनपर कोई शक न हो इसलिए उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी और वायसराय हार्डिंग पर हुए हमले की निन्दा भी की। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी १९१५ में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब इंग्लैंड के अधिकांश सिपाही युद्ध में थे तब ये अलग अलग प्रवितियों द्वारा बाकि बचे अंग्रेजो को भागना चाहते थे पर वो ऐसाकर नही पाए क्यूंकि कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून १९१५ में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान के शहर शंघाई में पहुँचे और वहाँ रहकर भारत देश की आजादी के लिये काम करने लगे। जापान में उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। वहाँ पर उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। उन्होंने जापानी भाषा भी सीख ली और इस भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘रामायण’ का भी अनुवाद जापानी भाषा में किया। सन 1916 में रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और सन 1923 में जापानी नागरिकता ग्रहण कर ली। रासबिहारी बोस ने जापानी अधिकारियों को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने मार्च 1942 में टोक्यो में ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और भारत की स्वाधीनता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। जून 1942 में उन्होंने बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित किया गया। मलय और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। इसके बाद जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०ए० का पुनर्गठन किया। भारत को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने का सपना लिए भारत माता का यह वीर सपूत 21 जनवरी 1945 को परलोक सिधार गया। जापानी सरकार ने उन्हें ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से अलंकृत किया था। भारत माँ के इस सपूत को गगनभर श्रद्धांजलि............!! साभार : इन्टरनेट, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक (पुस्तक), भारतीय इतिहास