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भारत और भारत की आजादी का इतिहास बहुत लंबा है। इस देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए लाखों लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। पर इतिहास ने सबको वह जगह नहीं दी जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। इतिहासकारों ने सिर्फ गांधी नेहरू और उनके साथियों को ही कोई खास स्थान दिया और बाकियों के साथ नाइंसाफी की। इस इतिहास में सिर्फ गांधी-नेहरू और उनके समर्थकों को ही महत्व का स्थान प्राप्त हुआ है अन्यथा उनका विरोध करने वाले या उनके बताए मार्ग पर ना चलने वाले सभी क्रांतिकारियों को इतिहास ने वह सम्मान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था। भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्ला खान मंगल पांडे विनायक दामोदर मदनलाल धींगरा….! और ना जाने कितने ही क्रांतिकारियों को हम इतिहास और अपने जेहन से दूर कर चुके है, ऐसे ही एक महान क्रन्तिकारी थे जिनके बारे में कुछ बाते जान लेना अतिआवश्यक है। हम बात कर रहे है एक ऐसे क्रन्तिकारी की जिसके साथ इतिहास और इतिहासकारों ने सबसे ज्यादा अन्याय किया है। ये अन्याय सिर्फ और सिर्फ इसीलिए हुआ है क्यूंकि वो व्यक्ति किसी के विचारो के नीचे दब के नही रह सकता था, उसे इतिहास ने इसीलिए ठुकरा दिया क्यूंकि उनके पास खुद के विचार थे, उनके पास खुद की योजना थी और इन सबसे बड़ी बात ये कि उन्होंने गाँधी और नेहरु के पीछे खड़े होने से बेहतर अलग हो जाना सही समझा। हम बात कर रहे है "तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा" और चलो दिल्ली जैसे बेजोड़ और जोशीला नारा देने वाले भारत के पहले आई सी एस अधिकारी "नेता जी सुभाषचंद्र बोस" की। सुभाष की महत्वता इसी बात से जानी जा सकती है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों को जितना खौफ विश्व युद्ध का नहीं लगा उससे अधिक खौफ़ उन्हें आजाद हिंद फौज का था। उस समय आजाद हिंद फौज की कमान नेताजी के हाथों में थी। नेताजी के बेजोड़ नेतृत्व अद्भुत क्षमता और अटल इरादों के सामने अंग्रेज नतमस्तक होते होते जा रहे थे। पूर्वी भारत के अधिकांश हिस्सों को नेताजी आजाद करा चुके थे परंतु यह देश का दुर्भाग्य ही था कि वह देश को पूर्ण रुप से आजाद नहीं करा सके। नेता जी की महानता इसी बात से सिद्ध होती है कि उस समय का सबसे बड़ा तानाशाह नेता जिसके सामने सबकी घिग्घी बंध जाती थी, जिससे सामने आने से बहादुर से बहादुर भी कतराता था, जो शायद ही किसी को बहादुर गिनता था ऐसा हिटलर स्वयं नेताजी से मिलना चाहता था और उनके मिलने पर ससम्मान उनकी मेहमान नवाजी की। नेता जी के बारे में बात कटे हुए ब्रिटिश ऑफिसर:- 1964 में भारत की आज़ादी के समय ब्रिटेन के प्रधान मंत्री रहे क्लेमेंट एटली (Clement Attlee) भारत आये और बंगाल के राज्यपाल भवन में उन्होंने कहा की "भारत को आजादी देना हमारी मजबूरी थी" देश की जनता में नेताजी की लोकप्रियता नीचे दिए गये तस्वीर से साफ जाहिर होती है। देश के लोग नेताजी को कितना प्यार करते थे इस बात का प्रमाण उनके वर्मा के भाषण से प्राप्त हो ही जाता है जब उन्होंने लोगो के सामने आज़ादी की कीमत बताते हुए देश को रक्त देने का हुँकार भरते है और जनता उनके हुँकार में खो कर अपना सर्वस्य निछावर करने को तैयार हो जाती है। (इसी बात को गोपाल प्रसाद व्यास जी ने अपनी कविता खुनी हस्ताक्षर में बहुत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है) नेताजी की ताकत का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि खुद गाँधी उनके खिलाफ खड़े हो गये थे और उनके जीत पर उन्होंने बोला कि सुभाष की ये जीत मेरी हार है। आइए जानते है अपने प्यारे नेता जी के बारे में : - ताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस 'विद्रोही अध्यक्ष' ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।3 मई 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतन्त्रता संग्राम को और अधिक तीव्र करने के लिये जन जागृति शुरू की। 3 सितम्बर 1939 को मद्रास में सुभाष को ब्रिटेन और जर्मनी में युद्ध छिड़ने की सूचना मिली। उन्होंने घोषणा की कि अब भारत के पास सुनहरा मौका है उसे अपनी मुक्ति के लिये अभियान तेज कर देना चहिये। 8 सितम्बर 1939 को युद्ध के प्रति पार्टी का रुख तय करने के लिये सुभाष को विशेष आमन्त्रित के रूप में काँग्रेस कार्य समिति में बुलाया गया। उन्होंने अपनी राय के साथ यह संकल्प भी दोहराया कि अगर काँग्रेस यह काम नहीं कर सकती है तो फॉरवर्ड ब्लॉक अपने दम पर ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू कर देगा। अगले ही वर्ष जुलाई में कलकत्ता स्थित हालवेट स्तम्भ जो भारत की गुलामी का प्रतीक था सुभाष की यूथ ब्रिगेड ने रातोंरात वह स्तम्भ मिट्टी में मिला दिया। सुभाष के स्वयंसेवक उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ ले गये। यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी। इसके माध्यम से सुभाष ने यह सन्देश दिया था कि जैसे उन्होंने यह स्तम्भ धूल में मिला दिया है उसी तरह वे ब्रिटिश साम्राज्य की भी ईंट से ईंट बजा देंगे। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने सुभाष सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओं को कैद कर लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिये सुभाष ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। हालत खराब होते ही सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। मगर अंग्रेज सरकार यह भी नहीं चाहती थी कि सुभाष युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिये सरकार ने उन्हें उनके ही घर पर नजरबन्द करके बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया।[12] इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे। 8 मार्च 1943 को जर्मनी से निकल कर नेताजी पूर्वी एशिया पहुंचे और वह पर उन्हें रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज की कमान सौप दी। 21 अक्टूबर 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये। आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने " दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा। जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परन्तु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसन्द किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श प्रस्तुत किया। अपनी फ़ौज को कमजोर पड़ता देख नेताजी ने गाँधी से मदद की गुहार लगे पर गाँधी जो की तहेदिल से नेताजी से नफरत करते थे उनके साथ आने के पक्ष में नही दिखे और अंतत आजाद हिन्द फ़ौज कमजोर पड़ गयी और उसे हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में नेता जी जापान जाने के लिए निकल पड़े थे थे पर कहा जाता है की रस्ते में विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी पर कुछ लोगो का कहना है कि ये गलत है क्यूंकि किसी को भी उनकी लाश नही मिली थी। ऐसे शख्स का भारत में पैदा होना बेहद गर्व की बात है पर अफ़सोस ये है कि हम ना ही उनसे कुछ सीख सके और ना ही उनकी कुर्बानियों को याद रखा।