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"चेतक" इतिहास जानने वाले या इतिहास का तनिक भी ज्ञान रखने वाले सभी लोगों को एक नाम जरूर ही पता होता है, और वो नाम है चेतक! यूँ तो चेतक का जिक्र हर उस समय आता है जब जब महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच युद्ध का जिक्र होता है पर सिर्फ युद्ध के जिक्र के समय ही चेतक को याद करना उसकी महानता के अनुरूप नही मानी जा सकती। चेतक स्वयं अपने आप मे एक इतिहास ही है, एक ऐसा किस्सा जो ये बताता है कि अगर आपके रगों में रक्त के साथ साथ स्वामिभक्ति और देशभक्ति बहता हो तो इंसान ही क्या जानवर भी खुद के क्षमता से परे जा कर कार्य करते है। स्वामिभक्ति,वफ़ादारी, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का इससे उत्तम उदाहरण शायद ही इतिहास का कोई और किरदार दे सके। एक तो मेवाड़ सामान्यतः ही वीरो और शेर से भी भिड़ जाने वाले साहसी वीरों को जन्म देने वाला स्थल रहा हैं,पर कभी कभी इतिहासकार और बुद्धिजीवियों के लिए ये वाकया दाँतो तले उंगली दबाने जैसा हो जाता कि एक मामूली सा घोड़ा जो युद्ध मे बुरी तरह से घायल और ना चल पाने की स्थिति में होने के बाबजूद अपने स्वामी को एक असम्भव सी लगने वाली ऊंचाई एक छलांग में पर करके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता है। चेतक महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा था और नीलवर्ण का ईरानी घोड़ा था। चेतक अश्व गुजरात मे चोटीला के पास भीमोरा गांव का था। खोड गांव के दंती शाखा के चारण ने भीमोरा के काठी राजपुत के पास से चेतक अश्व खरीदा था। चारण व्यापारी काठीयावाडी नस्ल के तीन घोडे चेतक, त्राटक और अटक लेकर मारवाड आया। अटक परीक्षण में काम आ गया। त्राटक महाराणा प्रताप ने उनके छोटे भाई शक्ती सिंह को दे दिया और चेतक को स्वयं रख लिया। चेतक की वीरता और स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा को हिंदी साहित्य के वीर रस के कवि श्यामनारायण पांडेय जी ने अपनी कविता में इतने मार्मिक रूप से चित्रित किया है कि एक बार पढ़ने या सुनने पर भी हम उस महान जानवर की महानता को महसूस करने लगते है। श्यामनारायण पांडेय जी ने चेतक के बारे में लिखा है कि रण बीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड़ जाता था राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में फँस गया शत्रु की चालों में बढ़ते नद-सा वह लहर गया फिर गया गया फिर ठहर गया विकराल वज्रमय बादल-सा अरि की सेना पर घहर गया भाला गिर गया गिरा निसंग हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग इस कविता का सामान्य अर्थ ये होता है कि चेतक एक ऐसा अश्व था जो हवा से तेज़ और साहसी था।युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल वह एक बरसाती नाला उलांघ कर अन्ततः वीरगति को प्राप्त हुआ। आज भी चित्तौड़ की हल्दीघाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। चेतक की स्वामिभक्ति पर बने कुछ लोकगीत मेवाड़ में आज भी गाये जाते हैं। महाराणा प्रताप के बाद लक्ष्मीबाई के घोड़े का जिक्र आता है जिसने स्वामिभक्ति और राष्ट्रभक्ति के पराकाष्ठा को प्राप्त करके अद्वितीय मिशाल पेश की है।

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